लुधियाना – हाल ही में हरियाणा और हिमाचल प्रदेश में राज्यसभा उम्मीदवारों के चयन को लेकर कांग्रेस द्वारा लिए गए फैसलों ने राजनीतिक गलियारों में नई चर्चा छेड़ दी है। पार्टी ने पारंपरिक और चर्चित चेहरों की बजाय अपेक्षाकृत कम चर्चित नेताओं को मौका देकर सभी को चौंका दिया। इस बदलाव को कांग्रेस की नई राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जा रहा है।
हरियाणा में दलित समुदाय से जुड़े कमवीर सिंह बौद्ध को राज्यसभा के लिए उम्मीदवार बनाना और हिमाचल प्रदेश में जिला स्तर के नेता अनुराग शर्मा को मौका देना इस बात का संकेत माना जा रहा है कि पार्टी अब केवल बड़े और स्थापित चेहरों पर निर्भर रहने की बजाय जमीनी कार्यकर्ताओं और स्थानीय नेतृत्व को आगे बढ़ाने की नीति अपना रही है।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस का यह प्रयोग आने वाले समय में अन्य राज्यों के चुनावों में भी दिखाई दे सकता है। खासकर पंजाब में अगले वर्ष होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र पार्टी की उम्मीदवार चयन प्रक्रिया पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं। माना जा रहा है कि पार्टी इस बार टिकट वितरण में पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ संगठन में सक्रिय, क्षेत्र में मजबूत पकड़ रखने वाले और साफ छवि वाले नेताओं को प्राथमिकता दे सकती है।
पार्टी सूत्रों के मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व यह भी समझ चुका है कि केवल बड़े नामों के सहारे चुनाव जीतना अब आसान नहीं रहा। ऐसे में जमीनी स्तर पर काम करने वाले नेताओं को आगे लाकर पार्टी कार्यकर्ताओं में उत्साह बढ़ाने और संगठन को मजबूत करने की कोशिश की जा सकती है।
यहां जिक्रयोग है कि पंजाब में कांग्रेस पहले भी कई बार टिकट वितरण को लेकर आंतरिक असंतोष का सामना कर चुकी है। इसलिए इस बार पार्टी ऐसी रणनीति बनाने की कोशिश में है जिससे स्थानीय समीकरणों, सामाजिक प्रतिनिधित्व और कार्यकर्ताओं की मेहनत तीनों के बीच संतुलन बनाया जा सके।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि अगर कांग्रेस इसी तरह अप्रत्याशित और संगठन आधारित फैसले लेती है तो पंजाब विधानसभा चुनाव में टिकट वितरण का फार्मूला भी काफी हद तक बदला हुआ नजर आ सकता है। यही वजह है कि पार्टी की आगामी रणनीति और संभावित उम्मीदवारों के चयन को लेकर अभी से राजनीतिक हलकों में कयासों का दौर शुरू हो गया है।
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पंजाब के संदर्भ में यह मुद्दा इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि यहां पार्टी लंबे समय से गुटबाजी की समस्या से जूझती रही है। हाल ही में बरनाला में आयोजित कांग्रेस की रैली के दौरान वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने भी मंच से पार्टी की सीनियर लीडरशिप को स्पष्ट संदेश दिया था कि व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर सभी को “टीम प्लेयर” की तरह काम करना होगा। उनके इस बयान को पार्टी के भीतर अनुशासन और एकजुटता का संकेत माना गया था।
राजनीतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि राहुल गांधी की यह हिदायत और अन्य राज्यों में उम्मीदवार चयन के हालिया फैसले इस बात की ओर इशारा करते हैं कि कांग्रेस आने वाले विधानसभा चुनावों में संगठन को प्राथमिकता देते हुए नए और जमीनी चेहरों को आगे ला सकती है।
ऐसे में पंजाब में टिकट वितरण को लेकर इस बार का फार्मूला पहले से अलग हो सकता है। पार्टी नेतृत्व स्थानीय समीकरणों, सामाजिक प्रतिनिधित्व, संगठनात्मक सक्रियता और जीतने की क्षमता इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखकर उम्मीदवारों का चयन कर सकता है। यही वजह है कि आगामी विधानसभा चुनाव को लेकर कांग्रेस की रणनीति और संभावित उम्मीदवारों के चयन पर अभी से राजनीतिक हलकों में कयासों का दौर शुरू हो गया है।
उम्मीदवार चयन में नया प्रयोग कर रही कांग्रेस, पंजाब चुनाव से पहले बदली रणनीति के संकेत
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